केवल व्यक्ति नहीं, सहयोगी व्यवस्था भी

गंभीर नवाचार के प्रयास को अलग-अलग सफलताओं से आगे बढ़कर धैर्य से चलने वाली सहयोगी व्यवस्था क्यों बनानी चाहिए।

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व्यक्तिगत उपलब्धि महत्वपूर्ण है। वह समुदाय के सामने प्रत्यक्ष उदाहरण रखती है और युवाओं का विश्वास बदलती है। लेकिन अकेले व्यक्ति किसी क्षेत्र को ज्ञान अर्थव्यवस्था में नहीं ले जा सकते।

यदि कोई विद्यार्थी केवल असाधारण व्यक्तिगत दृढ़ता के बल पर सफल होता है, तो उसकी उपलब्धि सम्मान योग्य है; लेकिन उससे अभी दूसरों के लिए रास्ता नहीं बनता। रास्ता तब बनता है जब अगला विद्यार्थी बेहतर दिशा, तैयारी, उपकरण और विश्वास के साथ आगे बढ़ सके।

सहयोगी व्यवस्था की शुरुआत कैसी हो सकती है

ऐसी व्यवस्था का अर्थ पहले ही दिन बड़ी इमारत या औपचारिक संस्था खड़ी करना नहीं है। शुरुआत नियमित रूप से मिलने वाले छोटे मार्गदर्शक समूह, अध्ययन मंडल, बार-बार होने वाली प्रतियोगिता, सार्वजनिक संसाधन-संग्रह या व्यावहारिक कंप्यूटिंग को गंभीरता से लेने वाले स्कूल से हो सकती है।

आकार से अधिक महत्वपूर्ण निरंतरता है। गतिविधियाँ तब स्थायी व्यवस्था बनती हैं, जब सीख सँभालकर रखी जाए, जिम्मेदारी बाँटी जाए और अगला समूह पिछले अनुभव से आगे बढ़े।

साझी सीख को सँभालना

व्यक्ति के जाने पर यदि उसके नोट, विधि, संपर्क और गलतियों की सीख भी चली जाए, तो हर नया समूह शून्य से शुरू करता है। सार्वजनिक दस्तावेज़, प्रोजेक्ट रिकॉर्ड और मार्गदर्शकों द्वारा ज्ञान व जिम्मेदारी का हस्तांतरण सामूहिक स्मृति बनाते हैं।

प्रतिभा तभी बढ़ती है, जब आसपास के लोग और संस्थाएँ पिछली पीढ़ी की सीख सँभालकर अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ। यही साझा स्मृति छोटी उपलब्धि को धीरे-धीरे बेहतर मानक में बदलती है।

प्रतिभा तभी बढ़ती है जब आसपास की संस्कृति पिछली पीढ़ी की सीख को संभालकर रखे।

अलग भूमिकाएँ, साझा दिशा

विद्यार्थी अभ्यास और जिम्मेदारी लाता है। शिक्षक रुचि पहचानता और अभ्यास के लिए समय निकालता है। परिवार धैर्य देता है। मार्गदर्शक तकनीकी मानक स्पष्ट करता है। संस्था स्थान और निरंतरता देती है। सहयोगी व्यापक अवसरों से जोड़ते हैं।

हर व्यक्ति को सब कुछ करने की जरूरत नहीं। मजबूत सहयोगी व्यवस्था स्पष्ट, सीमित और विश्वसनीय योगदानों को आपस में जोड़ती है।

शोर नहीं, धैर्य से बनी व्यवस्था

उत्तराखंड को प्रचार-प्रधान कार्यक्रमों के बजाय ऐसी व्यवस्था चाहिए जो छोटे, उपयोगी काम लगातार दोहराए। सार्वजनिक ध्यान दूसरी ओर चला जाए, तब भी क्लब चलते रहें, मार्गदर्शक लौटें और विद्यार्थी कठिन बुनियाद पर काम जारी रखें।

धैर्य का अर्थ कम महत्वाकांक्षा नहीं। इसका अर्थ ऊँचे मानक को इतने लंबे समय तक साधना है कि उपलब्धि संयोग के बजाय क्षमता का परिणाम बने।

सफलता का व्यापक अर्थ

एक पदक या स्टार्टअप महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन सहयोगी व्यवस्था की सफलता यह भी है कि कितने विद्यार्थी शुरू कर पाए, कितने टिके, कितने शिक्षक सक्षम हुए और कितना ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुँचा।

व्यक्ति संभावना का प्रमाण देता है। सहयोगी व्यवस्था उस प्रमाण को दूसरों के लिए रास्ते में बदलती है। इनोवेट इन उत्तराखंड को शुरुआत से दोनों की आवश्यकता है।

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